Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124
Physical Address
304 North Cardinal St.
Dorchester Center, MA 02124
हिंदू पंचांग में कुछ तिथियां ऐसी होती हैं जो कैलेंडर पर सिर्फ एक छोटी-सी तारीख नहीं लगतीं, बल्कि मन को थोड़ा रोककर भीतर देखने का अवसर देती हैं। एकादशी 2026 भी ऐसी ही धार्मिक तिथियों की श्रृंखला है, जिसे भगवान विष्णु की भक्ति, उपवास और आत्मसंयम से जोड़ा जाता है।
साल 2026 में आने वाली एकादशी व्रत की तिथियां अलग-अलग महीनों में पड़ेंगी। भक्त इन दिनों में उपवास, विष्णु पूजा, मंत्र जाप, गीता पाठ और दान-पुण्य जैसे धार्मिक कार्य करते हैं। हालांकि, किसी स्थान की सूर्योदय-सूर्यास्त गणना और पंचांग पद्धति के कारण तारीख या पारण का समय थोड़ा अलग दिखाई दे सकता है।
इसलिए केवल कैलेंडर में तारीख देखना ही पर्याप्त नहीं माना जाता। एकादशी तिथि, स्थानीय पंचांग, व्रत रखने का दिन और द्वादशी पारण को साथ में देखना ज्यादा सही तरीका है।
हिंदू पंचांग के अनुसार सामान्य रूप से एक चंद्र वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं। अधिकमास आने पर इनकी संख्या 26 तक भी हो सकती है। वर्ष 2026 के लिए प्रचलित पंचांग गणनाओं में एकादशी व्रत 2026 की सूची में अलग-अलग नामों से 24 व्रत शामिल हैं।
एकादशी प्रत्येक पक्ष की ग्यारहवीं तिथि होती है। यानी अमावस्या के बाद आने वाले शुक्ल पक्ष की ग्यारहवीं तिथि और पूर्णिमा के बाद आने वाले कृष्ण पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को एकादशी कहा जाता है।
इसीलिए एक महीने में आमतौर पर दो एकादशियां होती हैं। एक शुक्ल पक्ष में और दूसरी कृष्ण पक्ष में। यह व्यवस्था समझ आ जाए तो एकादशी कब है जैसे सवाल का जवाब पंचांग में ढूंढना काफी आसान हो जाता है।
नीचे वर्ष 2026 की प्रमुख एकादशी की तारीख और उनके पारंपरिक नाम दिए गए हैं। अलग-अलग स्थानों के पंचांग में सूर्योदय और तिथि के आधार पर मामूली अंतर हो सकता है, इसलिए व्रत रखने से पहले स्थानीय पंचांग देखना अच्छा रहता है।
| महीना | एकादशी | पक्ष |
|---|---|---|
| जनवरी | षटतिला एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| जनवरी | जया एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| फरवरी | विजया एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| फरवरी | आमलकी एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| मार्च | पापमोचिनी एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| मार्च | कामदा एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| अप्रैल | वरुथिनी एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| अप्रैल | मोहिनी एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| मई | अपरा एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| मई | पद्मिनी एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| जून | परम एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| जून | निर्जला एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| जुलाई | योगिनी एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| जुलाई | देवशयनी एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| अगस्त | कामिका एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| अगस्त | श्रावण पुत्रदा एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| सितंबर | अजा एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| सितंबर | परिवर्तिनी एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| अक्टूबर | इन्दिरा एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| अक्टूबर | पापांकुशा एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| नवंबर | रमा एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| नवंबर | देवुत्थान एकादशी | शुक्ल पक्ष |
| दिसंबर | उत्पन्ना एकादशी | कृष्ण पक्ष |
| दिसंबर | मोक्षदा एकादशी | शुक्ल पक्ष |
यह सूची एक उपयोगी एकादशी कैलेंडर की तरह काम कर सकती है, लेकिन किसी विशेष शहर में व्रत की अंतिम तारीख तय करते समय स्थानीय सूर्योदय और तिथि समाप्ति को जरूर जांचना चाहिए।
शुक्ल पक्ष अमावस्या के बाद शुरू होने वाला चंद्र पक्ष है, जिसमें चंद्रमा धीरे-धीरे पूर्णिमा की ओर बढ़ता है। इसी पक्ष की ग्यारहवीं तिथि को शुक्ल पक्ष एकादशी कहा जाता है।
दूसरी ओर, पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाले घटते चंद्रमा के पक्ष को कृष्ण पक्ष कहते हैं। इसकी ग्यारहवीं तिथि कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है।
इस तरह एकादशी तिथि को समझने के लिए सिर्फ तारीख याद करने की जरूरत नहीं पड़ती। यह समझना ज्यादा उपयोगी है कि तिथि चंद्रमा की स्थिति पर आधारित है, इसलिए अंग्रेजी कैलेंडर की तारीख हर साल बदलती रहती है।
सनातन परंपरा में एकादशी व्रत को भगवान विष्णु की भक्ति और आत्मसंयम से जोड़ा गया है। भक्त इस दिन अपनी दिनचर्या को सरल रखते हैं और पूजा-पाठ, ध्यान, मंत्र जाप तथा धार्मिक कार्यों में मन लगाने की कोशिश करते हैं।
एकादशी का महत्व केवल भोजन छोड़ देने तक सीमित नहीं माना जाता। धार्मिक दृष्टि से यह इंद्रिय नियंत्रण, संयम, भक्ति और मन की शुद्धि का अवसर भी माना जाता है।
कई वैष्णव भक्त इस दिन भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं और ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप करते हैं। किसी के लिए यह कठोर उपवास होता है, तो कोई अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार करता है।
एकादशी व्रत नियम परंपरा और परिवार के अनुसार कुछ अलग हो सकते हैं। इसलिए किसी एक नियम को हर व्यक्ति पर लागू करना ठीक नहीं होगा।
आम तौर पर भक्त दशमी से ही भोजन और व्यवहार में संयम रखने की तैयारी करते हैं। एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, स्नान, प्रार्थना, मंत्र जाप और दान-पुण्य को शुभ माना जाता है।
कुछ लोग पूर्ण उपवास रखते हैं, जबकि दूसरे लोग फलाहार करते हैं। स्वास्थ्य, उम्र और व्यक्तिगत परिस्थिति को ध्यान में रखना भी जरूरी है; धार्मिक व्रत को अपनी क्षमता से बाहर ले जाना उद्देश्य नहीं होना चाहिए।
व्रत की भोजन परंपरा क्षेत्र और परिवार के अनुसार बदल सकती है। सामान्यतः एकादशी का भोजन सात्विक और अनाज रहित रखने की परंपरा कई घरों में देखी जाती है।
फल, दूध, मेवे, नारियल, साबूदाना, कुट्टू और शकरकंद जैसी चीजें कई लोग एकादशी फलाहार में इस्तेमाल करते हैं। कुछ परिवारों में सेंधा नमक का प्रयोग भी किया जाता है।
केला, अंगूर, आम, बादाम, पिस्ता और अन्य फल-मेवे साधारण फलाहार का हिस्सा बन सकते हैं। लेकिन हर सामग्री हर परंपरा में स्वीकार हो, ऐसा जरूरी नहीं है।
कई व्रत परंपराओं में गेहूं, चावल और सामान्य अनाज को एकादशी के दिन वर्जित माना जाता है। इसलिए एकादशी में क्या नहीं खाना चाहिए यह सवाल व्रत रखने वाले व्यक्ति के लिए काफी महत्वपूर्ण होता है।
कुछ धार्मिक परंपराओं में मसूर की दाल, सामान्य नमक और कुछ अन्य खाद्य पदार्थों से भी परहेज किया जाता है। प्याज, लहसुन तथा अन्य सामान्य भोजन से बचने की परंपरा भी कई घरों में मिलती है।
यहां एक छोटी-सी सावधानी जरूरी है—व्रत के नियमों की अलग-अलग परंपराएं हैं। इसलिए अपने परिवार की परंपरा या विश्वसनीय स्थानीय पंडितजी से पुष्टि करना बेहतर रहेगा।
सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनना और पूजा स्थान को साफ करना सामान्य रूप से शुभ माना जाता है। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जा सकती है।
एकादशी पूजा विधि में भगवान विष्णु को प्रणाम करना, पुष्प अर्पित करना, मंत्र जाप करना और अपनी श्रद्धा के अनुसार प्रार्थना करना शामिल हो सकता है।
भक्त गीता पाठ, विष्णु मंत्र और धार्मिक कथा का श्रवण भी करते हैं। पूजा बहुत बड़ी होनी ही चाहिए, ऐसा आवश्यक नहीं; कई बार शांत मन से की गई छोटी-सी प्रार्थना ही दिन को खास बना देती है।
एकादशी व्रत कथा की परंपरा कई हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों से जुड़ी हुई है। विभिन्न एकादशियों के साथ अलग-अलग पौराणिक कथाएं और धार्मिक मान्यताएं बताई जाती हैं।
पद्म पुराण और स्कन्द पुराण सहित विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में एकादशी की महिमा से संबंधित वर्णन मिलते हैं। इन कथाओं का उद्देश्य केवल चमत्कार बताना नहीं, बल्कि श्रद्धा, संयम और धर्माचरण के महत्व को समझाना भी माना जाता है।
इसलिए कथा सुनते समय उसके आध्यात्मिक संदेश पर ध्यान देना उपयोगी है। कथा मन को यह याद दिलाती है कि व्रत सिर्फ भूखा रहने का नाम नहीं, बल्कि अपने व्यवहार पर भी थोड़ा पहरा लगाने की परंपरा है।
हर एकादशी पर्व का अपना नाम और उससे जुड़ी धार्मिक मान्यता है। उदाहरण के लिए षटतिला एकादशी में तिल से जुड़े धार्मिक कर्मों का महत्व बताया जाता है, जबकि निर्जला एकादशी कठोर उपवास के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है।
देवशयनी एकादशी को भगवान विष्णु के योगनिद्रा में जाने से जोड़ा जाता है। इसके बाद आने वाली देवुत्थान एकादशी को भगवान विष्णु के जागरण की धार्मिक मान्यता से जोड़ा जाता है।
इसी तरह मोक्षदा एकादशी, पापमोचिनी एकादशी, कामदा एकादशी, विजया एकादशी और पापांकुशा एकादशी जैसे नाम अपने-अपने धार्मिक संदर्भ रखते हैं। भक्त इन दिनों को अपनी आस्था के अनुसार अलग महत्व देते हैं।
निर्जला एकादशी एकादशी व्रतों में सबसे कठिन मानी जाने वाली तिथियों में गिनी जाती है। नाम से ही संकेत मिलता है कि परंपरागत रूप से इसमें जल तक का त्याग किया जाता है।
लेकिन हर व्यक्ति के लिए ऐसा कठोर व्रत उचित हो, यह जरूरी नहीं। शरीर की जरूरतों और स्वास्थ्य को नजरअंदाज करके धार्मिक उपवास करना समझदारी नहीं है।
भक्ति का अर्थ स्वयं को नुकसान पहुंचाना नहीं है। इसलिए जो व्यक्ति निर्जला व्रत नहीं रख सकता, वह अपनी क्षमता के अनुसार पूजा, प्रार्थना या फलाहार कर सकता है।
एकादशी पारण यानी व्रत खोलने का समय सामान्यतः अगले दिन द्वादशी तिथि में निर्धारित किया जाता है। लेकिन पारण का सही समय स्थान और पंचांग की गणना पर निर्भर करता है।
इसी वजह से केवल “सुबह व्रत खोल लेना” पर्याप्त जानकारी नहीं है। एकादशी पारण समय देखने के लिए अपने शहर के सूर्योदय और द्वादशी तिथि की स्थिति को देखना चाहिए।
पारण से पहले और बाद की तिथियों को लेकर भी धार्मिक नियम होते हैं। इसलिए विशेष रूप से कठिन व्रत करने वाले श्रद्धालु स्थानीय पंचांग के अनुसार चलना पसंद करते हैं।
एकादशी को कई भक्त अपना दिन थोड़ा शांत रखने की कोशिश करते हैं। सुबह स्नान, भगवान विष्णु की पूजा और मंत्र जप के बाद धार्मिक ग्रंथ पढ़ना या सुनना अच्छी परंपरा मानी जाती है।
दान-पुण्य भी इस दिन के धार्मिक आचरण का हिस्सा माना जाता है। जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता, भोजन देना या अपनी क्षमता के अनुसार दान करना भक्ति को व्यवहार से जोड़ देता है।
ब्रह्मचर्य, संयम, कम बोलना और क्रोध से बचना भी कई व्रत परंपराओं में महत्वपूर्ण माना जाता है। आखिर व्रत का एक उद्देश्य मन को भी थोड़ा उपवास कराना है, सिर्फ पेट को नहीं।
धार्मिक परंपराओं में एकादशी पर अनावश्यक हिंसा, क्रोध, छल-कपट और असंयम से बचने की सलाह दी जाती है। यानी एकादशी में क्या नहीं करना चाहिए का उत्तर केवल भोजन से संबंधित नहीं है।
कुछ परंपराओं में बाल कटवाने, अत्यधिक सांसारिक गतिविधियों और जीव हत्या से बचने की बात भी कही जाती है। चींटियों या छोटे जीवों को नुकसान न पहुंचाने जैसी मान्यताएं भी कुछ स्थानों पर प्रचलित हैं।
इन नियमों का मूल भाव संयम और करुणा है। दिन को बोझिल नियमों की सूची बनाने के बजाय शांत, सात्विक और धार्मिक बनाने की कोशिश अधिक सार्थक हो सकती है।
एकादशी का संबंध विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना से माना जाता है। भक्त विष्णु मंदिर जाते हैं, घर में पूजा करते हैं या शांत बैठकर भगवान का स्मरण करते हैं।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का जाप विष्णु भक्ति में प्रसिद्ध है। कोई व्यक्ति इसे अपनी श्रद्धा और समय के अनुसार जप सकता है, बिना किसी दिखावे के।
कई परिवारों में बुजुर्ग बच्चों को एकादशी की कथा सुनाते हैं। ऐसे छोटे पारिवारिक क्षण धार्मिक कैलेंडर को सिर्फ तारीखों की सूची नहीं रहने देते, बल्कि उसे अगली पीढ़ी तक पहुंचने वाली परंपरा बना देते हैं।
व्रत के साथ दान-धर्म को जोड़ने की परंपरा भी हिंदू धार्मिक जीवन में दिखाई देती है। अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंदों की सहायता करना इस दिन के पुण्य कर्मों में शामिल माना जाता है।
दान हमेशा बड़ी रकम का ही होना चाहिए, ऐसा नहीं। भोजन, वस्त्र या किसी जरूरतमंद व्यक्ति की वास्तविक जरूरत पूरी करना भी सेवा का रूप हो सकता है।
एक बुजुर्ग श्रद्धालु अक्सर कहा करते हैं कि “व्रत का असली स्वाद तब आता है, जब उसका थोड़ा-सा पुण्य किसी और के काम भी आए।” यही भावना एकादशी को निजी साधना से आगे ले जाती है।
अगर आपका सवाल 2026 में एकादशी कब है है, तो सबसे पहले अपने शहर का नाम तय करें। इसके बाद उस स्थान के हिंदू पंचांग में एकादशी तिथि और सूर्योदय देखें।
विशेष रूप से व्रत रखने वाले लोगों को केवल तारीख नहीं, बल्कि दशमी, एकादशी और द्वादशी तीनों तिथियों की स्थिति देखनी चाहिए। इससे व्रत शुरू करने और पारण करने में गलती की संभावना कम होती है।
नई दिल्ली जैसे शहरों के लिए उपलब्ध पंचांग और किसी दूसरे शहर के पंचांग में समय अलग हो सकता है। इसलिए इंटरनेट पर दिखने वाली किसी एक सामान्य तारीख को अंतिम मान लेना हमेशा सही तरीका नहीं है।
कई परंपराओं में दशमी से तैयारी शुरू करने की बात कही जाती है। इसका उद्देश्य अगले दिन के उपवास के लिए भोजन और दिनचर्या को धीरे-धीरे संयमित करना है।
दशमी की रात भारी भोजन से बचना, मन को शांत रखना और अगले दिन की पूजा की तैयारी करना उपयोगी माना जाता है। यह धार्मिक अनुशासन को अचानक शुरू करने के बजाय धीरे से दिनचर्या में लाता है।
अगले दिन एकादशी पर श्रद्धालु अपनी क्षमता के अनुसार उपवास, विष्णु पूजा, गीता पाठ और मंत्र जाप करते हैं। फिर द्वादशी में निर्धारित समय के अनुसार पारण किया जाता है।
एकादशी हिंदू पंचांग की ग्यारहवीं चंद्र तिथि है। प्रत्येक पक्ष में एक एकादशी आती है, इसलिए सामान्य वर्ष में लगभग 24 एकादशी व्रत होते हैं।
इसे भगवान विष्णु की भक्ति, आत्मसंयम, आध्यात्मिक साधना और धार्मिक अनुशासन से जोड़ा जाता है। अलग-अलग परंपराओं में इसके धार्मिक लाभों की अलग व्याख्या मिलती है।
कई हिंदू व्रत परंपराओं में चावल सहित अनाज का सेवन एकादशी पर वर्जित माना जाता है। यह धार्मिक व्रत नियम है, सामान्य पोषण संबंधी नियम नहीं।
कई परंपराओं में फल, दूध और मेवे से फलाहार किया जाता है। हालांकि, व्रत की व्यक्तिगत और पारिवारिक परंपरा देखना जरूरी है।
कई घरों में साबूदाना व्रत के भोजन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन तैयार करते समय उपयोग होने वाली दूसरी सामग्री भी व्रत-अनुकूल होनी चाहिए।
आमतौर पर व्रत का पारण अगले दिन द्वादशी में निर्धारित समय पर किया जाता है। सही पारण का समय स्थान और पंचांग के अनुसार देखना चाहिए।
इसकी अवधि हर एकादशी और स्थान के अनुसार समान नहीं होती। व्रत का प्रारंभ और पारण स्थानीय तिथि तथा सूर्योदय की गणना से निर्धारित किया जाता है।
एकादशी 2026 की तारीखें याद रखना उपयोगी है, लेकिन इस पर्व की सुंदरता सिर्फ कैलेंडर में टिक लगाने से नहीं आती। यह उन दिनों में से एक है जब इंसान अपनी भागती हुई दिनचर्या को थोड़ा धीमा कर सकता है।
कोई भगवान विष्णु का नाम ले, कोई गीता पढ़े, कोई मंदिर जाए, कोई दान करे और कोई केवल अपने भीतर शांति के लिए कुछ समय निकाले—भक्ति के ये रूप अलग हो सकते हैं।
एकादशी व्रत 2026 में भी वही पुराना संदेश लेकर आएगा: भोजन पर संयम के साथ विचारों पर संयम, पूजा के साथ करुणा और उपवास के साथ आत्मचिंतन। तारीख बदलती रहती है, लेकिन यह भावना हर वर्ष उतनी ही पुरानी और उतनी ही नई लगती है।
Gyaras, also known as Ekadashi, comes twice every lunar month—once during Shukla Paksha and once during Krishna Paksha.
The exact Ekadashi date changes each month according to the Hindu Panchang, so check the local calendar for the correct date and fasting time.
Gyaras is observed on the eleventh lunar day (Ekadashi) of each Paksha. There are generally 24 Gyaras or Ekadashi fasts in a year.
The Ekadashi date depends on the month and location. For the correct fasting date, check the 2026 Ekadashi calendar along with the local sunrise timings.
The date depends on which Ekadashi you are asking about. Each Ekadashi has a different date in the Hindu lunar calendar.
वर्ष 2026 की एकादशी तारीखें भक्तों को पूरे साल भगवान विष्णु की आराधना, उपवास और आत्मसंयम के कई अवसर देती हैं। षटतिला एकादशी से लेकर मोक्षदा एकादशी तक प्रत्येक तिथि अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपरा रखती है।
व्रत रखने से पहले स्थानीय हिंदू पंचांग, एकादशी तिथि और पारण समय जरूर जांचें। भोजन और उपवास के नियम भी अपनी पारिवारिक परंपरा, उम्र और व्यक्तिगत क्षमता के अनुसार समझें।
अंततः एकादशी का सबसे सुंदर पक्ष शायद यही है कि यह हमें कुछ देर के लिए बाहरी शोर से दूर होकर भगवान का स्मरण करने, मन को शांत करने और किसी दूसरे के जीवन में थोड़ी भलाई जोड़ने का मौका देती है। श्रद्धा, संयम और दान-पुण्य के साथ मनाई गई एकादशी सचमुच कैलेंडर की एक तारीख से कहीं अधिक बन जाती है।